सुनो, बग़ावत कर रहे अब सरसों के खेत
पीली-पीली आग नव जागृति का संकेत

जो फसलों को रौंदते, फिरते अब तक प्रेत
गेहूँ की बाली प्रखर गुभ-चुभ करें अचेत

लोमड़ियाँ बसती रहीं, खोद मटर के खेत
फलियों! तुम इस बार वे, खंडित करो निकेत

पानी उनके घर गया, खेत हो गये रेत
‘होले’ से गोले बने, चने श्याम औ’ श्वेत

करवट ले खलिहान ही, बाली-फूल समेत
मौसम कहे पुकार कर, रामचेत! अब चेत (99)

सभी रंग बदरंग हैं कैसे खेलूँ रंग
बौराया तेरा शहर घुली कुएँ में भंग

पूजाघर के पात्र में राजनीति के रंग
या मज़हब के युद्ध हैं या कुर्सी की जंग

कंप्यूटर पर बैठकर उड़े जा रहे लोग
मेरे काँधे फावड़ा मुझे न लेते संग

होली है पर चौक में नहीं तमाशा एक
कब से गूँगी ढोलकें बजी न कब से चंग

इनके महलों में रचा झोंपड़ियों का खून
बुर्जी वाले चोर हें , चीखा एक मलंग

ऐसी होली खेलियो खींच मुखौटे , यार!
असली चेहरा न्याय का देख सभी हों दंग (98)

सबका झंडा एक तिरंगा होने दो
घायल नक्शे को अब चंगा होने दो

यह राजरोग कुर्सी ने फैलाया है
अब नहीं कहीं भी यूँ दंगा होने दो

बनो सपेरे, नाग इशारे पर नाचें
मत जयचंदों को दोरंगा होने दो

मस्जिदें तुम्हारे चरणों पर घूमेंगी
मुल्ला की फ़ितरत को नंगा होने दो

क्या कहा भगीरथ ? शंकर हो जाओगे
तुम ज़रा पसीने को गंगा होने दो (97)

शोलों से भरी हुई शब्दों की झोली हो
यह समय समर का है, बम-बम की बोली हो

कुर्सी के होंठों पर जनता का लोहू है
माथे पर चाहे ही चंदन हो, रोली हो

संसदी बिटौरे में वोटों के उपले हैं
जाने कब आग लगे ,जाने कब होली हो

कुर्ते का, टोपी का कोई विश्वास नहीं
क्या पता कि वर्दी (खादी) में ,चोरों की टोली हो

फूलों के कंधों पर बंदूकें लटका दो
शायद माली पर भी खंजर या गोली हो (96)

शहर तुम्हारा ? हमने देखा शहर तुम्हारा
शासक-चोर, लुटेरा-नेता शहर तुम्हारा

संगीनों की नोंक मिली जिस ओर गए हम
बख्तरबंद पुलिस का पहरा शहर तुम्हारा

फुटपाथों को चना-चबेना मिल न सका पर
आदमखोर हुआ सब खाता शहर तुम्हारा

देह किसी ने बेची, कोई बच्चे बेचे
बदले में ठोकर ही देता शहर तुम्हारा

गाँवों के काँधे चिन दीं ऊँची मीनारें
लें अँगड़ाई तभी गिरेगा शहर तुम्हारा

की मनमानी भर आँखों में मोम सभी की
सूर्य उगा है अब पिघलेगा शहर तुम्हारा (95)

रो रही है बाँझ धरती , मेह बरसो रे
प्रात ऊसर, साँझ परती, मेह बरसो रे

सूर्य की सारी बही में धूपिया अक्षर
अब दुपहरी है अखरती , मेह बरसो रे

नागफनियाँ हैं सिपाही , खींच लें आँचल
लाजवंती आज डरती , मेह बरसो रे

राजधानी भी दिखाती रेत का दर्पण
हिरनिया ले प्यास मरती , मेह बरसो रे

रावणों की वाटिका में भूमिजा सीता
शीश अपने आग धरती , मेह बरसो रे (94)

राजपथों पर कोलाहल है, संविधान की वर्षगाँठ है
गली-गली में घोर गरल है, संविधान की वर्षगाँठ है

पैने हैं नाखून उन्हीं के, मुट्ठी में क़ानून उन्हीं के
उन्हें विखंडन बहुत सरल है, संविधान की वर्षगाँठ है

शासन अनुशासन बेमानी, मंदिर-मस्ज़िद की मनमानी
रक्तपात की नीति सफल है, संविधान की वर्षगाँठ है

घर में आग लगाय जमालो, खड़ी-खड़ी मुस्काय जमालो
शांतिचक्र ध्वज आज विकल है, संविधान की वर्षगाँठ है

कब तक जनता सहे अकेली, मरती खपती रहे अकेली
जनपथ से उमड़ा दलबल है, संविधान की वर्षगाँठ है

कुर्सी का उपदंश बढ़ चुका, वोट-नोट का वंश बढ़ चुका
शल्य-चिकित्सा केवल हल है, संविधान की वर्षगाँठ है (93)

रक्त का उन्माद हैं ये, युद्ध की बातें
मृत्यु का संवाद हैं ये, युद्ध की बातें

एक धरती, एक राजा, लाख जौहर पर
विजय का अपवाद हैं ये, युद्ध की बातें

हथकड़ी बेड़ी पहन लो या मरो बम से
दमन का अनुवाद हैं ये, युद्ध की बातें

पाक बांग्ला चीन बर्लिन, बाड़-दीवारें
खेत घर आबाद हैं ये, युद्ध की बातें

जो बड़े, वे कर रहे, व्यापार शस्त्रों का
भेड़िया आस्वाद हैं ये, युद्ध की बातें

भेद को देते हवा जो, थाम लो कालर !
मुक्ति पर अपराध हैं ये, युद्ध की बातें (92)

यूँ जवानी खो रहा है आदमी
जानवर ही हो रहा है आदमी

पेट की खातिर सुनो इस धूप में
आदमी को ढो रहा है आदमी

रोशनी को क़त्ल करके, रात में
दाग़ अपने धो रहा है आदमी

पीढ़ियाँ फिर-फिर उगेंगी जूझती
ख़ून अपना बो रहा है आदमी

अब सृजन के गीत गाओ, अग्निकण!
फिर जगे जो सो रहा है आदमी (91)

मौन बैठे तोड़कर निब जज सभी
लाल स्याही में रँगे काग़ज़ सभी

रूप ने विश्वास को छल कर कहा
प्यार में, व्यापार में जायज सभी

आसनों पर बैठ टीका वेद की
कर रहे जो जन्म से जारज सभी

कल्पना जिसने सजाया था गगन
पहन मृगछाला चली वह तज सभी

जाल को मछली निगलने को चली
जागरण का देख लो अचरज सभी

अब कला के देखिए तेवर नए
सादगी ने जीत ली सजधज सभी (90)