पुरखों ने कर्ज लिया, पीढ़ी को भरने दो
May 7, 2009
पुरखों ने कर्ज लिया, पीढ़ी को भरने दो
अपराधी हाथों की, जासूसी करने दो
कर रहा हवा दूषित, भर रहा नसों में विष
मत तक्षक को ऐसे, उन्मुक्त विचरने दो
आया था लोकतंत्र, वर्षों से सुनते हैं
छेदों से भरी-भरी, नौका यह तरने दो
यातना-शिविर जिसने, यह शहर बनाया है
पापों का धर्मपिता , मुख आज उघरने दो
जनगण के प्रहरी बन, सड़कों पर निकलो तुम
लो लक्ष्य बुर्जियों के, द्रोही सब मरने दो [107]
जलती बारूद बनो अब बुर्जों पर छाओ रे
May 7, 2009
जलती बारूद बनो अब बुर्जों पर छाओ रे
हर बुलडोज़र के आगे पर्वत बन जाओ रे
इन खेतों में आँगन को यूँ कब तक बाँटोगे?
मंदिर में सिज़्दे, मस्जिद में प्रतिमा लाओ रे
ये टूटे दिल के नग्मे गाने से क्या होगा?
ज़ालिम मीनारें टूटें कुछ ऐसा गाओ रे
‘गा’ गोली, ‘बा’ बंदूकें, ‘खा’ से खून-पसीना
‘रा’ रोटी, ‘आ’ आग और ‘ला’ लहू पढ़ाओ रे
अब और न तश्तरियों में यह ज़िन्दा मांस सजे
रोटी के हक़ की ख़ातिर तलवार उठाओ रे [106]
कच्ची नीम की निंबौरी, सावन अभी न अइयो रे
May 2, 2009
कच्ची नीम की निंबौरी, सावन अभी न अइयो रे
मेरा शहर गया होरी, सावन अभी न अइयो रे
कर्ज़ा सेठ वसूलेगा, गाली घर आकर देगा
कड़के बीजुरी निगोरी, सावन अभी न अइयो रे
गब्बर लूट रहा बस्ती, ठाकुर मार रहा मस्ती
है क्वाँरी छोटी छोरी, सावन अभी न अइयो रे
चूल्हा बुझा पड़ा कब का, रोजा रोज़ाना सबका
फूटी काँच की कटोरी, सावन अभी न अइयो रे
छप्पर नया बना लें हम, भर लें सभी दरारें हम
मेघा करे न बरजोरी, सावन अभी न अइयो रे
खुरपी ले आए धनिया, जग जाएँ गोबर-झुनिया
हँसिया ढूँढ़ रही गोरी, सावन अभी न अइयो रे (105)
हो गए हैं आप तो ऋतुराज होली में
May 2, 2009
हो गए हैं आप तो ऋतुराज होली में
वे तरसते रंग को भी आज होली में
काँख में खाते दबाए आ गया मौसम
खून से वे भर रहे हैं ब्याज होली में
चौक में है आज जलसा भूल मत जाना
भूख की आँतें बनेंगी साज होली में
हर गली उद्दण्डता पर उतर आई है
खुल न जाए राजपथ का राज़ होली में
कब कई प्रह्लाद लेंगे आग हाथों पर ?
कब जलेगी होलिका की लाज होली में ? (104)
हादसे अब घटने चाहिएँ
May 2, 2009
हादसे अब घटने चाहिएँ
यार ! बादल छँटने चाहिएँ
कुर्सी मरखनी हो गई है
इसके सींग कटने चाहिएँ
पढ़ो ‘रा’ से रोटी, रथ नहीं
श्रम के गीत रटने चाहिएँ
भरे गोदाम से अनाज के
पहरे सभी हटने चाहिएँ
‘जनगण की छातियों में दफ़न
ज्वालामुखी फटने चाहिएँ (103)
हर दफ्तर में एक बड़ी सी, कुर्सी पाई जाती है
May 2, 2009
हर दफ्तर में एक बड़ी सी, कुर्सी पाई जाती है
जिसके आगे बड़े-बड़ों की, कमर झुकाई जाती है
अंग्रेज़ों की बात नहीं है, यह अपना ही शासन है
सुनो ! पेट की ख़ातिर रेहन, रीढ़ धराई जाती है
मछुआरा हर बॉस यहाँ पर, बाँसी-काँटा थामे है
रोज़ी का संकट भारी है, देह भुनाई जाती है
ठाली अफ़सर, खाली दफ्तर, घूम-घूमकर देखा है
गाल बजाए जाते हैं या, जय-जय गाई जाती है
सहने की सीमा होती है, कितना और सहें, यारो!
क्यों जनता कुलवधू बिचारी , मौन सताई जाती है
उठो, सत्य के पहरेदारो ! तोड़ झूठ के मयखाने
सौ-सौ संगीनें उठने पर, कलम उठाई जाती है (102)
हमलावर शेरों को चिंता में डाला है
May 2, 2009
हमलावर शेरों को चिंता में डाला है
हिरनी की आँखों में प्रतिशोधी ज्वाला है
सागर में ज्वार उठें, लहरें तेवर बदलें
अवतरित हो रही जो, यह जागृति-बाला है
पृष्ठों पर आग छपी, सनसनी हाशियों पर
अख़बारों ने संध्या-संस्करण निकाला है
सदियों ने बहुत सहा शूली चढ़ता ईसा
हाथों में कील ठुकी, होठों पर ताला है
सड़कों पर उतरी है सुकराती-भीड़ यहाँ
मीरा-प्रह्लादों को प्यारा यह प्याला है (101)
हटो, यह रास बंद करो
May 2, 2009
हटो, यह रास बंद करो
हास-परिहास बंद करो
यह कलम है, खुरपी नहीं
छीलना घास बंद करो
गूँजती युद्ध की बोली
खेलना ताश बंद करो
भूख का इलाज बताओ
यार! बकवास बंद करो (100)
सुनो, बग़ावत कर रहे अब सरसों के खेत
May 2, 2009
सुनो, बग़ावत कर रहे अब सरसों के खेत
पीली-पीली आग नव जागृति का संकेत
जो फसलों को रौंदते, फिरते अब तक प्रेत
गेहूँ की बाली प्रखर गुभ-चुभ करें अचेत
लोमड़ियाँ बसती रहीं, खोद मटर के खेत
फलियों! तुम इस बार वे, खंडित करो निकेत
पानी उनके घर गया, खेत हो गये रेत
‘होले’ से गोले बने, चने श्याम औ’ श्वेत
करवट ले खलिहान ही, बाली-फूल समेत
मौसम कहे पुकार कर, रामचेत! अब चेत (99)
सभी रंग बदरंग हैं कैसे खेलूँ रंग
May 2, 2009
सभी रंग बदरंग हैं कैसे खेलूँ रंग
बौराया तेरा शहर घुली कुएँ में भंग
पूजाघर के पात्र में राजनीति के रंग
या मज़हब के युद्ध हैं या कुर्सी की जंग
कंप्यूटर पर बैठकर उड़े जा रहे लोग
मेरे काँधे फावड़ा मुझे न लेते संग
होली है पर चौक में नहीं तमाशा एक
कब से गूँगी ढोलकें बजी न कब से चंग
इनके महलों में रचा झोंपड़ियों का खून
बुर्जी वाले चोर हें , चीखा एक मलंग
ऐसी होली खेलियो खींच मुखौटे , यार!
असली चेहरा न्याय का देख सभी हों दंग (98)